Mar 03 2026 / 7:55 AM

शरीर में पंच तत्वों का महत्व, उन्हें संतुलित रखना बहुत जरूरी: भूमिका

देश की जानी-मानी एस्ट्रोलॉजर, मोटिवेशनल स्पीकर और ऑकल्ट साइंस प्रैक्टिसनर भूमिका कलम जी पिछले कई वर्षों से ज्योतिष विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रही हैं, जीवन में ज्योतिष का महत्व और ज्योतिष के विज्ञान को लेकर युवाओं के मन में उत्पन्न भ्रम को दूर कर रही हैं। भूमिका कलम ने देशभर में कई सेमिनार और परिचर्चाओं में हिस्सा लेकर युवाओं का सही मार्गदर्शन किया है। वे अपनी वेबसाइट www.astrobhoomi.com के माध्यम से भी ज्योतिष से जुड़ी जानकारियां साझा करती हैं, जिससे आमजन को लाभ मिलता है। इस लेख में भूमिका शरीर के पंच तत्वों का महत्व के बारे में जानकारी दे रही हैं।

हम सभी जानते है कि हमारा शरीर पांच तत्वों (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) से मिल कर बना है। ये पंचतत्व अपनी विशेष भूमिका निभाते हैं। ये पांचों मूल तत्व एक-दूसरे की सहायता कर शरीर को संचालित करते हैं। एक तत्व दूसरे तत्वों को उनकी क्रियाओं द्वारा संतुलित करते हुए मूल रूप में लाते हैं। इन तत्वों में संतुलन को ही शारीरिक संगठन कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा शरीर तभी तक स्वस्थ है जब तक मूल तत्व संतुलित हो क्योंकि ये मूल तत्व मात्रा में बराबर रहने चाहिए। जब पंचतत्वों में कुछ भी गड़बड़ी होती है या किसी तत्व की कमी आ जाने पर या किसी एक तत्व में त्रुटि आने पर दूसरे शरीर का पोषण करने वाले तत्वों में गड़बड़ी आ जाती है। उसी के कारण रोग की उत्पत्ति होती है। एस्ट्रोभूमि प्लेटफार्म की फाउंडर एवं एस्ट्रोलॉजर मेटिवेशनल स्पीकर भूमिका कलम कहती हैं कि इन तत्वों को संतुलित रखना बहुत जरूरी है। यदि इन तत्वों में गड़बड़ होने लगती है तो हमारे शरीर में अलग-अलग रोगों की उत्पत्ति होना निश्चित हैं। कलम ने सभी पांचों तत्वों का हमारे शरीर पर प्रभाव और उनके असर के बारे में जानकारी दी।

  1. पृथ्वी — हमारे शरीर को पृथ्वी तत्व से जैविक बल मिलता है यदि इसमें कमी आ जाये तो शरीर अचेतन बन जाता है। अधिक मोटे, वजनवाले, मांसल, चबीवार्ले मनुष्यों में इसी तत्व का आधिपत्य होता है। पृथ्वी तत्व मे शरीर का स्थूल ढांचा, अस्थि व मांस की सत्ता पूर्ण रूप है। पृथ्वी तत्व वाला व्यक्ति मंद, सुस्त व अधिक कामी होता है। वे लोेग संघर्ष से दूर रहते हैं। जब हमारे शरीर में यह तत्व गड़बड़ी को प्राप्त होता है तो ऐसे लोग स्वार्थीपन का आनंद लेते हैं। यह तटस्थ तत्व है। वास्तुशास्त्रा में दक्षिणी दिशा में च्ंहम 68 पंचतत्व के दोष एवं उपाय वास्तु द्वारा भार बढ़ाने को बल दिया जाता है। शायद इसी कारण दक्षिण दिशा में सिर करके सोना स्वास्थ्य व सुखवर्धक माना गया है।

देह में पृथ्वी तत्व से संबंधित ऊर्जा की क्षतिपूर्ति हेतु आयुर्वेद अनुसार नंगे पाव जूते उतारकर घास या फर्श पर चलें।

  1. जल —यह तत्व मूत्रापिंड स्त्री-पुरूष के प्रजनन अंग लासिका गं्रथियों का केंद्र हैं। नसों में सक्रियता, प्रतिकार द्रव्य, यौन ग्रंथियों के चेतना के दोष व सुवीर्य मांस से अस्थि व मज्जा को उत्पन्न करता है और शरीर को स्वस्थता प्रदान करता है। यह तत्व शरीर के जीवन प्रवाह को संतुलित करता हुआ सुरक्षित करता है। इसका स्वभाव शीतल है। हमारे शरीर में कम से कम 75 प्रतिशत तक पानी रहता है। अत: शरीर के तापमान को बनाए रखने तथा खून की क्रियाओं में जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।  

देह में जल तत्व से संबंधित ऊर्जा की क्षति पूर्ति हेतू शुद्ध व स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिए।

  1. वायु – इस तत्व का केन्द्र छाती, फेफड़े, हृदय तथा श्वसन ग्रंथि है। वायु, शरीर का प्रमुख संरक्षक है तथा सामूहिक बल उत्पन्न करती हैं। वायु का पूरा प्रभाव स्वभाव मन (हृदय) पर होता है यह मुख्य तत्व है। वायु शरीर के प्रत्येक भाग को संचालित करती है। वायु के द्वारा श्वसन मल, मूत्रा की क्रियाएं होती हैं व हृदय गति करता है। यह आवाज करती हुई पित्त व कफ को गति देती है जो कि हमे आक्सीजन की आवश्यकता दशार्ता है। यदि मानव मस्तिष्क मे आॅक्सीजन की कमी हो जाए तो बहुत सी कोशिकाएं नष्ट हो जाएगी तथा मनुष्य जड़बुद्धि व अपंग हो जाएगा। वास्तु द्वारा विद्वानों ने वायु के दो गुण शब्द व स्पर्श भी माना है। स्पर्श का संबंध त्वचा से भी है। सच तो ये है कि संवेदनशील नाड़ी तंत्रा तथा मनुष्य की चेतना भी श्वास प्रक्रिया से जुड़ी है जिसका आधार वायु है। विद्वानों ने वायु का अधिष्ठाता भगवान विष्णु (पालनकत्र्ता) को माना है।

-देह में वायु तत्व से संबंधित ऊर्जा की क्षति पूर्ति हेतू पेड़-पौधों के बीच घूमना व गहरी साँस लेनी चाहिए। प्राणायाम और अनुलोम विलोम के माध्यम से भी वायु तत्व को सुधारा जा सकता है।

  1. आकाश- आकाश तत्व शरीर का पोषण करता है। शरीर के विष को बाहर निकाल कर निरोग करता है। थाईराइड टांसिल, लाटरस आदि पर नियंत्राण करता हुआ मन का पोषण करता है। यह तत्व प्रेम भावुकता का निर्माण करता है। स्त्रिायों मे यह तत्व अधिक पाया जाता है। आकाश तत्व में गड़बड़ी होने से हार्ट अटैक, लकवा, मूर्छा आदि रोग हो जाते हैं। आकाश तत्व पिट्यूटरी ग्रंथि व पिनियल ग्रंथि को संचालित करता है। पिट्यूटरी ग्रंथि दृष्टि, श्रवण तथा स्मरण शक्ति को नियंत्रित करती है। पीनीयल ग्रंथि चेतना व भावुकता को नियंत्रित करती है।

-देह मे आकाश तत्व की वृद्धि के लिए आकाश में तारों को देंखें।

  1. अग्नि- सूर्य पर निरंतर जलने वाली अग्नि, सभी ग्रहों को प्रकाशित करती है। शरीर में अग्नि तत्व का केंद्र जठर तिल्ली व यकृत है। अग्निरस, पाचक रस, पित्त रस को उत्पन्न करता है। अग्नि तत्व शरीर में तापमान को बनाए रखता है। सभी अंगों को सक्रिय रखता है व चर्बी, मांस व खून के निर्माण में सहायता करता है। यह तत्व जल को उष्णता प्रदान कर दृष्टि को नियंत्रित च्ंहम 70 पंचतत्व के दोष एवं उपाय वास्तु द्वारा करता है। आहार का पाचन व चेहरे को सुंदरता प्रदान करता है। इस तत्व में कमी आ जाने पर पीलिया, एनीमिया, अजीर्ण, बेहोशी, आंखों की कमजोरी व आंखों के रोग व एसिडिटी (गैस) आदि बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। इन पांच तत्वों का प्रभाव हमारे कार्य, प्रारब्ध, भाग्य तथा आचरण पर भी पड़ता हैं। जल यदि सुख-संतोष देता है, संबंधों की ऊष्मा सुख बढ़ाती है तो वायु देह में प्राण वायु बनकर डोलती है। आकाश महत्वाकांक्षा जगाता है तो पृथ्वी सहनशीलता व यथार्थ का पाठ पढ़ाती है। देह में अग्नितत्व बढ़ने पर जल की मात्रा बढ़ाकर उसका संतुलन करना चाहिए। इसी प्रकार वायु दोष होने पर आकाश तत्व बढ़ाना उत्तम होता है।

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